हर्षदेव
राहुल गांधी ने महंगाई और भ्रष्टाचार के लिए गठबंधन की मजबूरी को जिम्मेदार क्या ठहराया कि शरद पवार की राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी तमतमा गई। हालांकि यूपी दौरे में जब युवकों ने राहुल से महंगाई और भ्रष्टाचार पर सफाई मांगी थी तो जवाब में उन्होंने किसी पार्टी का नाम नहीं लिया था। यह तो ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ वाली कहावत हुई। मात्र 9 सांसदों के साथ केन्द्र सरकार में हिस्सेदारी निभा रही राकांपा का चरित्र शुरू से ही गिरगिट की तरह रहा है। शरद पवार वही नेता हैं जो सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को आधार बनाकर कांग्रेस से अलग हुए थे और अब सत्ता प्रेम के नाते उसी कांग्रेस के साथ सरकार में बने हुए हैं। शरद पवार महाराष्ट्र के सशक्त नेता होने के साथ ही धन की मजबूत ताकत भी रखते हैं। लेकिन विचारधारा और सिद्धांत की बात करें तो वह हमेशा अवसरवाद और सत्ता की राजनीति में ही भरोसा करते हैं। इस समय पवार की पार्टी पूरे देश में नए सिरे से गठबंधन बनाने के प्रयासों में जुटी हुई है। दिलचस्प यह है कि एक ओर जहां वह पश्चिम बंगाल में वामपंथियों की धुर विरोधी ममता से तालमेल किए हुए है तो केरल में वह सत्तारूढ़ वाम मोर्चे का हिस्सा है। यह तो कुछ नहीं, घोटालों और महंगाई के कारण गंभीर संकट का सामना कर रही कांग्रेस में बगावत करने वाले नेताओं को उकसाने और भड़काने का काम करने की हिम्मत भी राकांपा कर रही है। पिछले दिनों उसने छत्तीसगढ़ में विद्याचरण शुक्ल के मामले में यही किया था और आजकल आंध्र के बागी कांग्रेस नेता जगन मोहन रेड्डी को उनकी बगावत में पवार भरपूर मदद दे रहे हैं। हाल में उन्होंने दिल्ली में जगन मोहन से खुद जाकर पौन घंटे तक मुलाकात की।
ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब महाराष्ट्र सरकार का घटक रहते हुए वह शिवसेना नेता बाल ठाकरे से मिलने पहुंचे थे। गोवा में भी वह कांग्रेस की गठबंधन सरकार का हिस्सा हैं। लेकिन उड़ीसा में उन्हें बीजू जनता दल का साथ भा रहा है। असम में राकांपा का मजबूत दल के साथ तालमेल की जिम्मेदारी टीके संगमा को सौंपी गई है। पवार के उस राजनीतिक अवसरवाद को भी लोग अभी भूले नहीं है जब वह एक साथ यूपीए और तीसरा मोर्चा की दोनों नावों पर सवार की कोशिश में लगे हुए थे।
कृषि मंत्री के तौर पर काम करते हुए शरद पवार की अपने मंत्रालय के प्रबंधन और व्यवस्था को लेकर जो भी उपब्धियां रही हैं, वे सबके सामने हैं। उनके पास दो मंत्रालय हैं- कृषि और आपूर्ति। पवार भले ही खाद्य वस्तुओं के प्रबंधन और महंगाई पर अंकुश के मामले में कोई जनहितपरक दूरदर्शिता और सूझबूझ न दिखा पाए हों, लेकिन राजनीतिक अवसरवाद और चतुराई देखने लायक है। कांग्रेस के मुकाबले पवार की पार्टी बहुत ही सीमित सदस्यों वाली और छोटी है। इसके बावजूद कांग्रेस जब भी संकट में होती है या सरकार में भागीदारी करने वाले दलों से उससे सहयोग की जरूरत होती है, तब पवार साथ देने के बजाय पीठ में छुरा घोंपने से चूकते नहीं हैं।
राहुल द्वारा शालीन तरीके से कही गई एक सहज और सही बात पर पवार ने अपने प्रवक्ताओं से जिस शैली और शब्दावली में प्रतिक्रिया दिलवाई, उसे किसी भी दृष्टि से शालीन नहीं कहा जा सकता। वह प्रतिक्रिया से ज्यादा धमकी और अपशब्दों की बौछार थी। पवार 1967 से राजनीति में हैं। वह केन्द्र में विभिन्न मंत्रालयों को संभालने के अलावा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। महंगाई से त्रस्त आम जनता को राहत देना तो दूर, आश्वासन के दो शब्द भी कहने से उन्हें परहेज है। सचमुच यह गठबंधन की मजबूरी है कि केन्द्र सरकार उन्हें एक घटक के रूप में साथ रखने के लिए मजबूर है।
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