डॉ. हर्षदेव
आज के भारतीय परिदृश्य में मुझे वह एक किंवदंती की तरह नजर आती हैं। एक विस्मय की तरह, जिसके चारों ओर शक्ति और रहस्य का एक कोहरा लिपटा दिखता था। एक सम्मोहनी मूर्ति जिसने एक साथ प्रेम, प्रशंसा, सराहना, पूजा और भय केअवतार के रूप में जीवन जिया।
26 साल पहले 31 अक्टूबर की वह सुबह आज भी याद है जब दुनियाभर में यह खबरआग की तरह फैल गई कि इंदिरा गांधी को उन्हीं के दो अंगरक्षकों ने गोलियों की ताबड़तोड़ बौछार करके चिर निद्रा में सुला दिया है। आज उनकी विरासत को भोगने-बेचने वाले, न तो उनके नायकत्व से प्रेरित हैं, न उनके साहस, संकल्प और दृढ़ता से। वे तो बस किसी भी तरह सत्ता के उस केन्द्र की डोर हाथ से छूटने नहीं देना चाहते जो उनकी आभा और तेजस्वी किरणों से जगमगाता था।
वह एक महान नेता के पितृत्व और शिक्षा के साथ बड़ी हुर्इं। पिता ने उनके सांस लेने और चारों ओर देखने के लिए दुनियाभर के दरवाजे खोल दिए थे। वह उस महीने पैदा हुर्इं, जब रूसी क्रांति हुई थी। यह बात उनके पिता प्रेरक प्रसंग की तरह उन्हें अकसर याद दिलाते थे। उनकी दीक्षा की इतनी फिक्र थी पिता को कि जेल में रहते हुए भी वह उन्हें दुनिया के तमाम समाजों के इतिहास और विकास की जानकारी देने के लिए लगातार पत्र लिखते थे। ये पत्र - ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’- संग्रह में प्रकाशित हैं।
मेरी उनसे कई मुलाकातें हुइं। इनमें कुछ सरसरी थीं तो एक-दो अविस्मरणीय। 1978 में जब वह अकाल का हाल देखने आगरा के हवाई अड्डे पर उतरीं तो मैं विस्मय से भर उठा। एक-दूसरे को मारकाट कर आगे पहुंचने के लिए बेताब कांग्रेसियों में से वहां एक भी नहीं था। लोकल पुलिस का एक सीओ और चार-पांच सिपाही जरूर थे। सूचना विभाग की जीप भी थी ,जिसमें बैठकर वह आसपास के गांवों में सूखे की हालत देखने गर्इं थीं। मैंने पूछा... स्वागत के लिए लोग नहीं हैं, क्या उन्हें सूचना नहीं थी?
- हम यहां ड्राउट देखने आए हैं। हमने किसी को आने के लिए नहीं कहा।
मैंने कहा- देश के राजनीतिक हालात के बारे में कुछ कहना चाहेंगी?
- आप पत्रकार हैं। खुद देख रहे हैं जो हो रहा है। किस तरह असंतोष पनप रहा है, जातिवाद फैलाया जा रहा है। लेकिन हमें राजनीति पर कुछ नहीं कहना है। लोग सब समझ रहे हैं।
हमेशा की तरह स्टार्च लगी हरी साड़ी में वह इतना कहकर जीप में बैठ गर्इं वह यूं ही जनचेतना की वाहक शक्तिसंपन्न नेता नहीं बन गई थीं। इसके लिए सबसे पहले उन्हें पार्टी के भीतर चौधरी बने बैठे नेताओं से पार पाना था। 1969-70 में उनके खिलाफ आगरा में मठाधीश बुजुर्ग (सिंडीकेट) कांग्रेसियों ने एक सम्मेलन किया। इसमें ‘नौसिखिया’ और ‘गूंगी गुड़िया’ कहकर उनकी हंसी उड़ाई गई। वे स्वयं किंगमेकर बनकर उन्हें ‘कठपुतली’ बनाए रखने के मंसूबे पाले हुए थे। इस धुरी को छिन्न-भिन्न करके ही शंकित-आशंकित और भयभीत मठाधीशों से मुक्ति पाई जा सकती थी। यही हुआ भी। 1971 में बांग्लादेश विजय अर्थात पाकिस्तान खंडित हुआ। 3 साल की अल्पावधि में ही ‘गूंगी गुड़िया’ को भारतीय जनसंघ के सर्वप्रिय वक्ता अटलबिहारी वाजपेयी ने देश की संसद में दुर्गा के रूप में अलंकृत कर दिया तो जनता सचमुच ठगी सी रह गई। प्रियदर्शनी को ज्ञात था कि देवी की छवि सचमुच उन्हें जनमानस में सर्वस्वीकार्य बना सकती है। वह उसी मार्ग की पथिक बन चलीं।
लगता है, महात्मा गांधी से सीखी उन्होंने सर्वस्वीकार्य बनने की कला। महात्मा गांधी ने जान लिया था कि ‘लोक’ नायक बनने के लिए कठोर यथार्थ नहीं, मिथ पैदा करना पड़ता है। गांधीजी ने रामराज्य के मिथ को ही जनांकाक्षा में ढाल दिया था। भविष्य का स्वप्न और अतीत की आस्था के समुच्चय को उन्नायक बनाकर वह स्वतंत्रता अनुष्ठान के सफल लक्ष्य के वाहक बन सके। संभावनाओं की माला गूंथकर उन्होंने उसमें सभी धर्मों और जातियों की सुगंध का गुलदस्ता बनाया, किंतु अपने धर्म का अनुशीलन भी बनाए रखा।
विपक्ष ने आक्रमण जारी रखे तो ऐसी सम्मोहिनी शक्ति का विसर्जन कर डाला जिससे उनका विरोध राष्ट्रघाती प्रतीत होने लगे। यहीं उनका एक कदम भटक गया। वह व्यामोह की शिकार हो गर्इं। आपद्काल वस्तुत: सिंहवाहिनी दुर्गा के ऐसे रौद्र रूप की अभिव्यक्ति बन गया जिससे उठे चक्रवात ने एकबारगी उन्हीं को परास्त कर डाला। एक नए प्रारंभ की तरह फिर भी उन्होंने मंजिल की ओर बढ़ने की निरंतरता बनाए रखी।
आपद्काल की ज्यादतियों और संवैधानिक अतिक्रमण की जांच के लिए जनता पार्टी की मुरारजी देसाई सरकार में गृहमंत्री चरण सिंह द्वारा गठित शाह आयोग की सुनवाई और पेशी के दौर में जब मैं थोड़ी प्रतीक्षा के उपरांत एक लंबी बातचीत के लिए 12, विलिंगडन क्रिसेंट पर उनसे मिला तो कुछ हताशा, तनाव, चमकभरी आंखों में कठोरता और चेहरे पर उम्र की सलवटों का संघर्ष होते देखा। उस दिन चौ. चरण सिंह का जन्मदिन यानी किसान दिवस था। किसानों की भारी भीड़ बोट क्लब के मैदान में जमा हुई थी। बातचीत के क्रम को तोड़ते हुए मैडम ने सहज जिज्ञासा से पूछा-‘कितने लोग जमा हुए हैं?’
मैंने अनुमान बताया- करीब 2 लाख।
इस पर उनका कहना था- ‘हमें तो 5 लाख की भीड़ बताई जा रही है।’
वह एक साधारण आकार का सामान्य सा ड्राइंगरूम था। लकड़ी के बेहद कामचलाऊ सोफे पड़े हुए थे। साथ के कमरे के दरवाजे पर पर्दा लटक रहा था। नेपथ्य से बच्चों का हल्का शोरगुल कानों में आ रहा था। मैडम सहज थीं। लेकिन तनाव साफ झलक रहा था। मेरी भेंटवार्ता का एक मुख्य प्रश्न उनके व्यक्तित्व से सीधे जुड़ा था-
आप इतने विवादों में हैं और एक पूरी सरकार आपके विरुद्ध है। फिर भी क्या कारण हैं कि सत्ता की समस्त चर्चाओं का केन्द्र अब भी आप ही बनी हुई हैं?
मैडम- ‘देखिए न, सरकार की मशीनरी की शक्ति किन कामों में लगी हुई है। सब मिलकर हमारे पीछे पड़े हैं। उन लोगों को विवादों से बड़ा लगाव है। इसीलिए वे सब आपस में लड़-भिड़ रहे हैं। हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी है और वह हम राजनीतिक तरीके से ही लड़ेंगे।’ बस संजय गांधी से जुड़े सवाल का जवाब देने से उन्होंने यह कहकर इनकार कर दिया कि ‘आप उन्हीं से बात कीजिए।’
मैडम से मिलने की प्रतीक्षा के दौरान संजय गांधी से मुलाकात हो गई थी। किसी ने बता दिया था कि आगरा से कोई पत्रकार मैडम के इंटरव्यू के लिए आया हुआ है। दोनों हाथों में दो असाधारण ऊंचे कद वाले डरावने दिखते कुत्तों को थामे संजय गांधी जब मेरे पास तक आए तो मैं एक बार तो सिहर गया। लेकिन कुत्ते शायद अच्छे-खासे ट्रेंड थे। उन्होंने आगरा में युवक कांग्रेस की हालत के बारे में जानकारी चाही और साथ ही जानना चाहा कि कौन लोग सक्रिय हैं। उसी समय अंदर से बुलावा आ गया। ‘युवा हृदय सम्राट’ अपने पालतुओं को लेकर कोठी के पिछवाड़े की ओर चले गए और मैं ड्राइंगरूम में।
1980 आते-आते जनता पार्टी का ठीक वही हश्र हो गया जो महाभारत के बाद विजयी पक्ष का हुआ। वंश ही नष्ट-भ्रष्ट हो गया। जनता पार्टी भानुमति के कुनबे की तरह तीन-तेरह में बदल गया। अत्यंत कंटकाकीर्ण मार्ग से सुरक्षित निकलकर आई इस करिश्माई शासक ने जब 1980 का चुनाव आने पर आगरा-फिरोजाबाद का दो दिन का दौरा किया तो प्रेसकर्मी इतने क्लांत हो गए कि उस हड्डीतोड़ थकावट से मुक्ति पाने में कई दिन लग गए। उन्होंने दो दिन में संभवत: 23 चुनावी सभाओं को संबोधित किया। पहले दिन फिरोजाबाद में रात्रि लगभग 11 बजे पहुंचकर विश्राम कक्ष की ओर प्रयाण किया, परंतु सुबह साढ़े 4 बजे फिर वैसी ही ताजादम होकर दौरे पर निकल पड़ीं। उनका करिश्मा जनमानस को जैसे दोबारा याद आ गया और वह फिर उस देवी के अनुसरण के लिए प्रवृत्त हो गया। लोगों ने आपद्काल के उनके कदमों की लड़खड़ाहट को भूल मानकर भुला दिया। अत: एक बार फिर वह ताकतवर शासक बनकर उसी आसन पर प्रतिष्ठापित होने में सफल रहीं। अपनी निष्ठुर राजनीति, निर्मम निर्णयों, हठ तथा अनेक बार अलोकतांत्रिक आचरण के बावजूद वह देश के साथ, जनमानस के साथ एक अटूट भावनात्मक संबंध स्थापित करने में सफल रहीं। अपने अंगरक्षकों के प्राणांतक आक्रमण से केवल एक दिन पहले ही उन्होंने भुवनेश्वर में एक आमसभा में कहा था- ‘मैं आज यहां हूं। हो सकता है, कल मैं ना रहूं। मुझे इस बात की परवाह नहीं है कि मैं जीवित रहूं या मर जाऊं। मैंने लंबा जीवन जीया है और मुझे गर्व है कि मैंने अपने लोगों की सेवा में अपना पूरा जीवन लगा दिया। और जब मैं मरुंगी तो मेरे खून का हर कतरा देश के काम आएगा। और उसे मजबूत करेगा।’
ये एक लोकधर्मी शासक के शब्द हैं। उनके प्राणोत्सर्ग से अब तक शासक के रूप में यह राष्ट्र 8 प्रधानमंत्री चुन चुका है। परंतु उनकी विरासत संभाल सकने में कोई भी सफल न हुआ। उनकी अनुकृति या नकल भले ही की गई हो।
